Tuesday, 28 February 2017

‘किटी - पार्टी’

‘किटी - पार्टी’ ‘‘संजू का ई. मेल आया है.’’ आदित्य की ऊँची आवाज डाइनिंग रूम के एक कोने से, जहाँ कम्पयूटर रखा था गूँजी...... ‘‘क्या लिखा है, पढ़ कर सुनाओं..........’’ अरूंधति ने किचन से ही गुहार लगाई. आवाज से उसकी खुश छलक न जाए, इसका उसने विशेष ध्यान रखा. जब भी विदेश में बसे बेटे की कोई खबर आती है अरूंधती उसे अपनी निजी सम्पत्ति की तरह छुपाना चाहती है. ‘‘हमें फिर से बुलाया है’’ एक लम्बे अंतराल के बाद आदित्य की आवाज आई. ‘‘लिखता है... पापा, अब आपको व माँ को वहाँ इंडिया में अकेले रहने की क्या जरूरत है. हमारे पास आकर रहिए. ईशा, आयशा का बचपन अपने दादा दादी की देखरेख में बीतेगा तो मैं व मिनी भी चैन से अपने काम में मन लगा सकेंगे...... सुन रही हैं आप …………। आदित्य के स्वर में उत्साह तो था, पर कटाक्ष का पुट ही अधिक था. आदित्य ने दुनिया देखी है. पूरे पैंतीस साल की नौकरी बजा कर पिछले साल ही तो रिटायर हुए हैं. दो-दो बेटों का ब्याह किया है, अनेक संस्थाओं की जिम्मेदारी सम्भाली है. लोगों की बातों का आशय वे चुटकी में भाँप लेने की कला में पूरे सिद्धस्त है, फिर संजू तो उनकी अपनी औलाद है.... आदित्य ने आगे पढ़ना शुरू किया, ‘‘लिखता है, -- यहाँ इंडिया की तरह नौकर-आया तो होते नहीं, सारा काम अपने हाथों से करना पड़ता है, उस पर से बच्चों की देखभाल के लिये जो नैनी रखी है, वह भी छुट्टियों में अपने घर चली जाती है. इसलिये हमने सोचा है कि अब आप लोग यहाँ आ जाइए. नैनी पर होने वाले बड़े खर्चे से तो आप दोनों पर होने वाला खर्च कहीं कम होगा. बच्चों को संस्कार तो आप लोग ही दे सकते हैं...... नैनी वह विदेशी औरत भला बच्चों को क्या संस्कार देगी. अगले महीने की पाँच तारीख से बच्चों की छुट्टियाँ है, उसके पहले आप लोगों को आना है, एयर टिकिट हम जल्दी ही भेज देंगे.’’ आदित्य आखिरी पंक्तियाँ सुना रहे थे कि अरूंधति छोटे तौलिये से हाथ पौंछती हुई उनके सामने आकर खड़ी हो गई. वह मुस्कुरा रही थी. अपने स्मार्ट बेटे की चालाकी भरी बातें भी उसे बहुत प्रिय हैं -- बहुत प्यार करती है वह संजू से. उस शाम अरूंधति को किटी पार्टी में जाना था, इसलिये वह घर का छोटा बड़ा सारा काम निपटा लेना चाहती थी, क्योंकि किटी पार्टी से लौटकर आओ तो कुछ काम करने का मूड ही नहीं बनता, बस वहाँ हुई तमाम बातों को आदित्य के साथ चटकारे ले लेकर दोहराने का मजा ही अलग होता है. आज अरूंधति कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी क्योंकि उसे अपनी सहेलियों को यह ताजा खबर देनी थी कि तीन महीने के अंतराल में वे फिर से अमरीका जाने वाले हैं. उनका कमाऊ बेटा जो बहुत ऊँचे ओहदे पर है, वही उनका टिकिट भी भेजेगा. अब क्यों, क्या, कैसे, यह अन्दर की बात है..... …... किटी पार्टी का नजारा आज कुछ बदला-बदला सा था. सुरेखा, दीप्ति, माया, रूबी, अलका सभी गजधर होटल के हाॅल में जमा तो थी, लेकिन जो शोर, हँसी, किलकारी हमेशा एक दूसरे का स्वागत किया करती थी, वह लापता थी. नीना व शीला अभी तक नहीं पहुँची थीं. शीला किटी पार्टी में पहुँचने वाली सबसे पहली सदस्या हुआ करती है, फिर आज वह क्यों नहीं पहुँची.......... कहीं कोई अशुभ बात तो नहीं हो गई.... नहीं...नहीं.... कल ही तो उसने सबको अपनी नातिन की फस्र्ट बर्थ-डे पार्टी में बुलाया था. यह बात अलग है कि अरूंधति नहीं जा पाई थी, क्योंकि उसे आदित्य के साथ उनके बाॅस की बेटी की शादी में जाना था. अरूंधति ने अनुमान लगाया कि सभी कल शीला की पार्टी में गई होंगी, और आज की यह चुप, वहीं घटी किसी घटना की प्रतिक्रिया है. उसने भी चुप रहना ठीक समझा. अब उसे नीना की चिंता ने घेर लिया. कुछ ही दिनों पहले नीना का एक्सीडेंट हुआ था... पर वह तो ठीक हो गई है... क्या बात है.... वह भी अभी तक नहीं पहुँची थी. अरूंधति नीना के बारे में सोचने लगी--- नीना दो दामादों व एक बहु की सास है। आजकल वह अनाथ, अपाहिज बच्चों का एक स्कूल चलाती है, पति अधिकतर अपने फार्म हाउस पर रहते हैं- ……उनकी और नीना की सोच में जमीन आसमान का अंतर है. पति को पत्नी का अपाहिज बच्चों का स्कूल चलाना अपमान जनक लगता है. बेशुमार धन क्या उन्होंने इसलिए कमाया है कि पत्नी घर से बाहर जाकर काम करे, वह भी टका सा? अपनी नाराजगी दिखाने का उन्होंने अजीब रास्ता निकाल लिया है. फार्म हाउस पर रहते हैं और पेड़ पौधों की सेवा करते हैं. कभी-कदा नीना फार्म हाउस पर जाती है, पर उसका मन वहाँ नहीं लगता है, और वह शीघ्र लौट आती है. नीना को जितना बेमानी लगता है यहाँ बेटी दामाद के साथ रहना, उतना ही अस्वाभाविक लगता है फार्म हाउस में रहना. उसने जान लिया है कि उसकी किसी को भी जरूरत नहीं है सिवाय उन अनाथ-अपाहिज बच्चों के जिनका वह स्कूल चलाती है. नीना की बड़ी बेटी भागलपुर के किसी छोटे से गाँव में रहती है, ना ही वह कभी आती है, ना ही कभी कोई कुशल-क्षेम का पत्र-व्यवहार करती है... एक तरह से सब उसे भूल चुके है..नीना का एकलौता बेटा माँ से इसलिये नाराज रहता है कि माँ ने, फार्म हाउस उसके नाम करवाने के लिये बाप से हील हुज्जत नहीं की. उसका मानना है कि उसका बाप अपनी अथाह सम्पदा पर कुंडली मारे बैठा है, उसका सोचना है कि हर बाप अपने बेटे के लिये धन जोड़ता है, न कि स्वयं उड़ाने के लिये. इसलिये उसने भी सबसे नाता तोड़ लिया है. नीना की छोटी बेटी आर्थिक रूप से सबसे कमजोर है. वह नीना के साथ ही रहती है, लेकिन अपने पति व बच्चे की दुनिया में मग्न रहती है, ..... पिछले साल जब नीना का कार एक्सीडेंट हुआ था. तब अस्पताल ले जाने से लेकर घर आने तक, पूरी सेवा उसकी किटी पार्टी की सहेलियों ने ही की थी. कार की मरम्मत, इनश्योरेंस आदि के झंझट आदित्य ने सम्हाले थे. अरूंधति ने देखा कि नीना पिछले दरवाजे से हाॅल में दाखिल हो रही है. गुमसुम सी.... अपनी विचार श्रंखलाओं को झटक, चेहरे पर तेज और वाणी में ओज भर कर अरूंधति ने प्रश्न किया, ‘‘अरे भई सब इतने चुप क्यों हैं? और अभी तक कोल्ड ड्रिंक भी सर्व नहीं हुई है, क्या बात है?’’ सुरेखा की ओर मुखातिब होकर बोली, ‘‘सुरेखा मैडम आपकी खातिरदारी के तो इतने चर्चे हैं, फिर आज यह ढील-ढील कैसी... क्या अपनी प्रिय सखी शीला के आने के बाद ही सर्व करवाओगी?’’ सबका ध्यान अपनी ओर खींचने में अरूंधति सफल तो हो गई, परंतु न कोई उत्तर मिला, न कोई हँसा खिलखिलाया.... तभी रूबी ने अरूंधति को आँखों के इशारे से अपने पास वाली कुर्सी पर आकर बैठने को कहा. फाइन नेट पर जरदोजी के काम वाला सलवार सूट रूबी के आकर्षक व्यक्तित्व में चार चाँद लगा रहा था. उसके बच्चे अभी छोटे हैं, बेटा दसवीं में और बेटी आठवीं क्लास में पढ़ते हैं. गाने-बजाने की बात हो, या फिर नयी-नयी डिशेज बनाने की, तब रूबी खूब बढ़-बढ़ कर बोलती है, लेकिन जब बहु या दामाद पुराण चल रहा हो तो मूक श्रोता बनी रहती है. अरूंधति ने रूबी के बगल वाली कुर्सी तनिक और सटाते हुए फुसफुसी आवाज में पूछा,--‘‘क्या बात है?’’ रूबी ने प्रश्न का उत्तर प्रश्न से ही दिया, ‘‘कल तुम शीला की बेटी की पार्टी में क्यों नहीं आई थी. बुलाया तो उसने तुम्हें भी था.’’ अरूंधति की शंका शायद सच है, उस पार्टी में ही कोई बात हुई है. अरूंधति बात की गहराई तक पहुँचना चाहती थी. शीला अभी तक नहीं आई थी. उसने सोचा कि बात यदि दीप्ति, माया, अलका या सुरेखा को लेकर होती तो यहाँ का माहौल आक्रामक होना चाहिए था. बातें जोर-जोर से हो रही होती, और जो वहाँ नही होती, उसकी बुराइयों के पुराण का टीला बन चुका होता. अवश्य कोई गम्भीर बात है. अरूंधति ने अपने स्वर को और धीमा व गोपनीय बनाते हुए रूबी को उत्तर दिया,-‘‘आदित्य के एम. डी. शर्मा जी की बेटी की शादी थी, वहाँ जाना बहुत जरूरी हो गया था. आदित्य की बात टाल न सकी, इसलिये नहीं आ पाई, बता न क्या हुआ था वहाँ? रूबी ने दरवाजे की ओर देखा, बेयरा पाइनपल डिलाइट, फ्रूट पंच, व कोक लेकर आ चुका था. दोनों ने अपनी-अपनी पसन्द के ड्रिंक उठाये, बातों का सिलसिला आगे बढ़ा. रूबी ने प्रश्न का उत्तर फिर प्रश्न से किया, ‘‘अरूंधति क्या तुझे मालुम है शीला व गुप्ता जी ने बेटी को बड़ा करने में कितनी मुसीबतों का सामना किया था. शादी के दस साल बाद गीता पैदा हुई थी.... वह भी सिजीरियन.’’ अरूंधति - ‘‘हाँ-हाँ वह सब पता है मुझे, कैसे सास ससुर की आँख बचा-बचाकर उस लड़की की फरमाइशें पूरी करती थी. गुप्ता जी अब अच्छी स्थिति में पहुँचे हैं न, जब से अगरबत्ती का बिसनेस शुरू किया है, जब तक नौकरी में थे एक अच्छा सोफा भी नहीं था उनके घर.’’ रूबी ने टोका, ‘‘जो भी कहो, शीला को मानते बहुत हैं गुप्ता जी, सुगृहिणी जो है।” अरूंधति चुप न रह सकी, ‘‘उस बेचारी ने कभी अपने लिये एक अच्छी साड़ी की भी इच्छा नहीं रखी, कभी भी कुछ चाहा तो सिर्फ गीता के लिये. एक से एक कपड़े पहनाये, मँहगे स्कूल में पढ़ाया, हाॅस्टल भेजा, यू. के. से बिसनेस मैनेजमेंट करवाने का खर्च कैसे सहा होगा यह तो वही जानते होंगे. अच्छा छोड़, कल क्या हुआ यह तो बता............” इस बीच अलका, दीप्ति, सुरेखा भी अपनी अपनी कुर्सी ले वहीं चली आई और एक बड़ा सा ग्रुप बन गया. आधुनिकता की दौड़ में दीप्ति इन लोगों से एक कदम आगे थी, दो दशक पहले उसने अंतरजातीय विवाह किया था, पति का अच्छा बिसनेस था, और एकलौता बेटा आई.आई.टी. से इंजीनियरिंग कर रहा था. रूबी से पूछे गये प्रश्न का उत्तर उसने दिया, ‘‘होना क्या था, पुराने, घिसे-पिटे ख्यालात हैं तो ‘काॅनफ्लिक्ट’ होना लाजमी है.’’ रूबी बोली, ‘‘लगभग दो साल हुये गीता ने अपने क्लास-मेट अख्तर से शादी करने की जिद की थी तब शीला पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा था. गुप्ता जी आग बबूला हो गये थे. बेटी को सर पर चढ़ाने के लिये शीला को बहुत कुछ सुनना पड़ा था, तरह-तरह से गुप्ता जी के मन के अंगार को झेला था शीला ने.’’ चुलबुली अलका ने जिज्ञासू बच्चे के समान प्रश्न किया, ‘‘पर शादी तो उसकी अख्तर से ही हुई न?’’ किसी ने कोई जवाब नहीं दिया. अलका की दो बेटियाँ हैं ...बड़ी बेटी फैशन डिजानिंग का कोर्स कर रही है, और छोटी बेटी सी. ए. का इम्तहान देने वाली है. बेटी की शादी में क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं, वह जानना चाहती थी। ‘‘माया तू बता, कल क्या हुआ था? तू तो उसी की काॅलोनी में उसके बराबर वाले फ्लैट में रहती है. पास-पास फ्लैट वालों को तो यह भी पता रहता है कि पति ने बिस्तर में क्या कहा.’’ अरूंधति की बात पर सभी खिलखिलाकर हँस पड़ी. माया, शीला की हमउम्र और बेहद प्यारी सहेली रही है. शादी कर के दोनों लगभग साथ-साथ एक दूसरे के पड़ोस में रहने आई थीं. जब माया छः सालों में तीन बच्चों की माँ बन गई, और शीला को एक भी न हुआ तो सम्वेदना, सहानुभूति जनित प्यार का रिश्ता बहनापे में बदल गया. अनेक कोशिशों के फलस्वरूप दस साल बाद जब शीला की गोद हरी हुई, तब से लेकर आज तक माया ने शीला का भर-पूर साथ दिया. माया का गला रूँधा हुआ और आँखें नम थी. उसकी हताशा और निराशा यूँ बाहर आई. ‘‘आखिर बच्चे इतने खुदगर्ज क्यों हो जाते हैं? याद है न एक बार शीला बहुत बीमार पड़ी थी, उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा था. आठ या नौ बोतल सलाइन चढ़ा था, उसकी आँते सूख गई थी, मरते-मरते बची थी.’’ सभी ने उँचे स्वर में हाँ में हाँ मिलाया और पूछा कि उस घटना से गीता का क्या सम्बंध है. माया ने तिरस्कार में हुँः उच्चारित किया फिर बोली, ‘‘सम्बंध है और सिर्फ उसी से सम्बंध है...गीता की अख्तर से शादी की जिद पूरी करवाने के लिये शीला ने खाना-पीना छोड़ दिया था. आठ दिन तो उसके व्यवहार से किसी को भी पता न चला कि वह भूखी रह रही है, पर कितने दिन..............एक दिन वह बेहोश हो, गिर पड़ी. अस्पताल के बिस्तर में पड़े-पड़े अपनी आँखों के करूण इशारे से शीला ने गुप्ता जी को मना लिया. शीला से बिछुड़ने की कल्पना मात्र ने गुप्ता जी के पत्थर दिल को मोम सा पिघला दिया. इस तरह हुई थी गीता और अख्तर की शादी. उसी गीता ने कल........ .छिः.........’’ माया का मन अजीब वितृष्णा से भर गया............वह चुप हो गई. कुछ देर के लिये सन्नाटा छा गया. हाथ में पकड़े हुये कोल्ड ड्रिंक के ग्लास, पकौडे, चिप्स स्थिर हो गये. शीला की इस सच्चाई का किसी को भी पता नहीं था....... अभी भी कल की घटना पहेली ही बनी हुई थी. कल क्या हुआ.........एक बड़ा सा प्रश्न चिन्ह सभी के चेहरे पर ??? ‘‘कल की घटना तो मेरे सामने की है.’’ सुरेखा ने, जो आज की पार्टी की मेजबान थी, मुँह खोला. ‘‘वह तो शीला ही है जो सब बर्दाश्त कर गई. मेरी सुकन्या ने ऐसा किया होता तो थू करती ऐसी बेटी पर, तब निकल कर बाहर आती.’’ अलका की मासूमियत फिर उछली, ‘‘और गुप्ता जी?’’ सुरेखा के जैसे अंतःचक्षु खुल गये हों, बोली,-‘‘आज मैं समझी कि गुप्ता जी एकदम गऊ क्यों और कब से हो गये हैं. कल तो मुझे बेहद गुस्सा आ रहा था उन पर, कि बेटी पत्नी का अपमान करे और बाप चूँ तक न करे. आज सोचती हूँ बेचारे बोलते भी कैसे, शीला को खोने का साहस दोबारा कहाँ से लाते......’’ अति बोझिल व गम्भीर वातावरण को हल्का करने के लिये अलका बोली,--‘‘अरे भई जल्दी से घटना बताओ, भूख से पेट में चूहे दौड़ रहे हैं।” सुरेखा ने स्नैक्स की प्लेटें चारो ओर घुमाने के बाद बताना शुरू किया, -- ‘‘जारंग होटल के बड़े से हाॅल में गीता-अख्तर ने अपनी बिटिया शेरू के पहले जन्मदिन की पार्टी रखी थी. सुस्वाद भोजन की महक भूख जगा रही थी, परंतु केक कटने का इंतजार तो करना ही था. केक कटा, गाना गाया गया, चिमकी भोंपू बरसे, गुब्बारे फूटे. कितनी खुश थी शीला. शेरू को सीने से चिपकाए गर्व से इठला रही थी शीला. सबसे कह रही थी कि उसने कुछ भी नही किया है, देखो तो, उसकी गीता का इंतजाम कितना परफेक्ट है। डिनर सर्व होने की घोषणा के साथ, सब टेबुल की तरफ टूट पड़े, गीता ने आग्रह किया कि मम्मी की सहेलियाँ पहले खा ले. रात्रि के दस बजने वाले थे, भूख और तृष्णा पराकाष्ठा पर थी, अतः हम सब जल्दी से बढ़ चले. शीला टेबुल के चारों ओर घूम रही थी, मानों कुछ तलाश रही हो, फिर वह एक झटके से पीछे हट गई. पिछले एक घण्टे से शेरू को शीला की गोद में देकर गीता अख्तर के दोस्तों के साथ हँसी-ठट्ठे में मस्त थी. शीला ने गीता के पास जाकर शेरू को थमाते हुए कहा, ‘‘इसे सँभालो हम घर वापस जा रहे हैं’’ और वापस जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई....सारा खाना मांसाहारी था, वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं था जो शीला, उसकी सहेलियों और गुप्ता जी के खाने लायक हो। गुप्ता जी तो प्याज लहसुन भी नहीं खाते हैं, हम सबको मालुम है, हर पार्टी में हम सभी उन लोगों के खाने का इंतजाम अलग से करती आई हैं, फिर गीता कैसे भूल गई..... शायद इसी अफसोस में शीला की आँखें नम हो गई थीं कि इतने में गीता तमतमाती हुई आई और बोली, -‘‘अब इतना नाटक करने की क्या जरूरत है, तुम्हें तो जैसे आदत पड़ गई है नाटक करने की... मालुम तो है न, कि अख्तर को घास फूस वाले खाने से कितनी चिढ़ है, हाई सोसायटी में रहना कब आयेगा..... अब ऐसा मुँह बनाकर दूसरों का मूड तो खराब न करो. कितना खुश है अख्तर आज...अपनी सहेलियों के सामने अख्तर की इज्जत का कुछ तो लिहाज करो।” इतना कहकर गीता जिस तेजी से आई थी उसकी दुगनी तेजी से वापस लौट गई, जहाँ अख्तर और उसके दोस्त खड़े हँसी-ठट्ठा कर रहे थे. गीता की हँसी के फौव्वारों ने मानों हम सभी के मुँह पर जोरदार तमाचा मारा...... सुरेखा क्षण भर रूकी, फिर बोली, ‘‘हम कुछ कहते, उसके पहले ही शीला तपाक से उठी, उसने तनिक दूर खड़े गुप्ता जी का हाथ पकड़ा, और उन्हें लगभग खींचते हुए हाॅल से बाहर निकलते समय हम लोगों से माफी माँगी और आँखों से ओझल हो गई. हम सभी हतप्रत थे.......गुप्ता जी को परिस्थिति का आभास भी नहीं था, यह उनके चेहरे के आश्चर्य से साफ झलक रहा था. आज तक गुप्ता जी अपनी सबसे बड़ी कमजोरी--शीला की खुशी -- के लिए झुकते आए थे, आज मानों शीला ने उनका स्वाभिमान उन्हें वापस लौटा दिया था.’’ सुरेखा चुप हो गई. सभी चुप हो गई. आज की किटी पार्टी में शीला का इंतजार करना अब बेमानी था. ‘हाई-टी’ सर्व हो चुकी थी. बेयरा दो बार आकर सूचना दे चुका था. अब उठना जरूरी हो गया था. सभी सहेलियाँ भारी मन लिये उठी, और अपनी-अपनी प्लेटें परोसने लगीं। ----------------------------------------

Monday, 6 February 2017

बसंत - ऋतु

बसंत - ऋतु एक सूरज ने कम्बल सरकाया, हवा हुई रूखी-रूखी सिकुड़े दुबके पंख-पखेरू , हर्षित बोले चीं चीं चीं, भाल-क्षितिज पर बसंत राज की, हुई है दस्तक, पुलकित हैं खग भरे उड़ान लम्बी नभ तक , धानी पीली चूनर ओढ़े, खेतों की दुल्हन डोले, रूप गर्विता अल्हड़ा, राग रंग रस घोले, मदमाती, मुस्काती,हौले-हौले करती स्वागत बसंत ऋतु का मुख पर झीनी चादर ओढ़े .. दो पर मैं कैसे करूँ बसंत का स्वागत मन मेरा बोले…. कल की तरह नहीं हूँ खुश मैं, कल जैसा उत्साह नहीं है, पंख कैसे फैलाऊँ मैं सोचो, उड़ने की इजाजत नहीं है, घात लगाये बैठे हैं बहेलिये चहकने की हिम्मत नहीं है ….. ‘’दामिनी’’ की कराह सुनकर, लगता जैसे…… बसंत मनाने की चाह नहीं है. सुधा गोयल 'नवीन'

Sunday, 5 February 2017

चार-कन्या --तसलीमा नसरीन---समीक्षा --

समीक्षा -- चार-कन्या --तसलीमा नसरीन पुस्तक मेले में घूमते हुए जब मेरी दृष्टि बांग्लादेशी कथाकार तसलीमा नसरीन के उपन्यास 'चार-कन्या' के हिन्दी अनुवाद पर पड़ी तब मैं स्वयं को न रोक सकी और झटपट खरीद लिया। अपने देश से निर्वासित, अति विवादित लेखिका के कम चर्चित उपन्यास को एक बार पढ़ना शुरू किया तो आद्योपांत पढ़ती ही चली गई। परम्परागत-रूढ़िवादी परिवारों में पली-बढ़ी लड़कियों के कन्धों पर सारी नैतिकता, सारी मान-मर्यादाओं को लाद दिया जाता है। सारे परिवार को खुश रखना, पति की आज्ञा का अक्षरशः पालन करना, अपनी इच्छाओं-आशाओं, महत्वाकांक्षाओं को ताक पर रखकर मूक कठपुतली की तरह हँसते हुए नाचने वाली को स्त्री आदर्श और 'अच्छी' बहु-बेटी दर्ज़ा देने वाले भूल जाते हैं कि नारी कोई काठ की बनी नहीं है। उसके सीने में भी एक दिल धड़कता है। उसकी भी सोच है, अरमान है। वह सिर्फ शरीर या मांस का लोथड़ा नहीं है। 'लज्जा' जैसी चर्चित कृति की लेखिका तसलीमा नसरीन का यह उपन्यास 'चार-कन्या स्त्री-विमर्श की कई खिड़कियां खोलता है, जिससे आती बयार से पाठक अछूता नहीं रह सकता। यमुना, नूपुर, शीला और झूमर चार बहनों की कहानी को लेखिका ने चार अध्यायों में बाँटा है-- दूसरा पक्ष, निमंत्रण, प्रतिशोध और भँवरे जाकर कहना। दूसरा पक्ष पत्रात्मक शैली में है। ब्रह्मपल्ली मैमनसिंह से नूपुर अपनी दीदी यमुना को बुबू का संबोधन देकर पत्र लिखती है। बातों ही बातों में जीवन की बड़ी-बड़ी सच्चाइयां उजागर हो जाती है। यमुना में अपने अधिकार-बोध की तीव्र जागरुकता है। उसे काफी कुछ भुगतना पड़ता है। समाज के उलटे-सीधे नियम उसे तोड़ कर रख देते हैं। स्त्री हमेशा शक के कटघरे में क्यों खड़ी कर दी जाती है? कोई भी रिश्ता स्वार्थ-रहित क्यों नहीं हो सकता? हमेशा स्त्री से ही बलिदान की आशा क्यों की जाती है? उसके काम को प्राथमिकता कब दी जायेगी? क्या हर बार किसी मुकाम पर पहुंचने के लिए स्त्री को रिश्तों के दलदल से होकर गुज़रना पड़ेगा? इन उत्तर खोजने के लिए लेखिका ने स्त्री-मन की गहराइयों में है। लेखिका की संवेदनशीलता/भावुकता की पराकाष्ठा देखकर आश्चर्य है कि जिसने स्वयं न भोगा हो, वह इतनी अंतरंग कोमल-कठोर भावनायें इतनी सहजता से कैसे व्यक्त कर सकता है सकता है। तसलीमा जी भले ही शरीर की डॉक्टर रहीं हों, परंतु मन की गहराइयों में उतर कर अछूते पहलुओं जिस अधिकार और विश्वास से उनकी लेखनी चली है, उसका कोई सानी नहीं है। नारी का उत्पीड़न कोई नयी बात नहीं है। निर्भया हो या शीला, नारी हमेशा ठगी जाती रही। सच्चे प्रेम की अभिलाषिनी शीला के सपनों का महल ताश के पत्तों के घर सा ढह जाता है जब उसका प्रेमी ही सौदागर निकलता है। निमंत्रण के बहाने शीला के साथ जो दुर्व्यवहार होता है वह छोटी-छोटी घटनायें लेखिका के शब्द-कौशल और शब्द-प्रवाह की संजीवनी से जीवंत हो उठी हैं। तसलीमा जी कहती हैं, "मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करती, न ही धर्म, झूठ, अंधश्रद्धा, राष्ट्रवाद, हिंसा में। मैं मानवता, अधिकार, आज़ादी, प्रेम, सद्भावना में विश्वास करती हूँ।" ऐसा धर्म जो आज़ादी नहीं दे सकता, प्रेम का गला घोंट देता हो, अंध-श्रद्धा और हिंसा में विश्वास करता हो, तसलीमा जी को स्वीकार नहीं। प्रेम ईश्वर का वरदान है, और नारी ईश्वर की श्रेष्ठतम रचना। नारी कोमल हो सकती है पर कमज़ोर नहीं। वह वसुधा सामान सहनशील तो है, पर सीमा पार कर आजमाने की कोशिश की तो प्रतिशोध की ज्वाला से ऐसे जलाती है कि जलने वाला उफ़ भी नहीं कर पाता। झूमर ने हारुन से बदला भी ले लिया और अपने सतीत्व पर आँच भी न आने दी। स्त्री-मन की गहराइयों में उतर कर लेखिका ने उसके अवसाद,पीड़ा-दुखः, स्वाभिमान, आत्मविश्वास, प्रेम, समर्पण सभी संवेगों को दुलराया, पुचकारा और सहलाया है। परिस्थितियां चाहे जितनी विकट हों, सारी दुनिया के साथ-साथ चाहे माँ-बाप भी विपरीत हो जाएँ, मानसिक-शारीरिक अत्याचार सहने पड़े, तब भी तसलीमा जी की नायिका हार नहीं मानती। भँवरे जाकर कहना में हीरा (नूपुर) अपनी नारकीय शादी-शुदा ज़िंदगी से बगावत करती है, अश्लील-अनर्गल इलज़ाम को अनदेखा कर भाग जाती है, मनजू चाचा और पापड़ी की मदद से एक अदद छोटी सी नौकरी और घर पाने में सफल हो जाती है। फिर उसे कैसर के रूप में अपनी चाहत और परम आनंद भी मिल जाता है। सुधा गोयल ‘नवीन’ जमशेदपुर 09334040697

Friday, 12 August 2016

एक हास्य व्यंग्य रचना " अफसोस है!! "

एक हास्य व्यंग्य रचना अफसोस है!! अफसोस कई प्रकार के होते हैं। अपनी गल्तियों पर अफसोस, दूसरे की नादानी पर अफसोस, फेल हो जाने का अफसोस, मंजिल न मिलने का अफसोस. कोई गिर गया, पैर टूट गया, एक्सीडेण्ट हो गया या मर गया........... इत्यादि। सूची इतनी लम्बी है और समय बहुत कम। मैं शीघ्रताशीघ्र मुख्य मुद्दे पर आ जाना चाहती हूँ। अफसोस का अर्थ होता है- दुखः होना। दुखः एक ऐसा स्थायी भाव है जिसकी प्रतिक्रिया एकान्त-प्रियता, पीड़ा, आँसू, अवसाद और निराशा होती है। दुखः की चरमस्थिति में व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है। उसका किसी से बात करने का मन ही नहीं करता है। दूसरों द्वारा समझाई जाने वाली दार्शनिक बातों से तो उसे मितली सी आने लगती है। कहते हैं कि दुखः बाँटने से कम होता है, लेकिन यह बात शत-प्रतिशत खरी नहीं है। कभी-कभी दुखः बाँटने के उद्देश्य से आने वाले मेहमान की मंशा उस दुखः की चर्चा करके तुलनात्मक अध्ययन करने की होती है, कि उसका दुःख ज्यादा है कि सामने वाले का। यदि सामने वाले के दुःख की तीव्रता अधिक हुई तो प्रत्यक्ष में तो वह प्रलाप के साथ आँसू भी बहा सकता है, परन्तु मन ही मन उस परमपिता परमेश्वर को धन्यवाद दे रहा होता है जिसने उसके ऊपर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखी हैं। दिल के किसी कोने में उसे अपने सत्कर्मों पर गर्व भी हो रहा होता है, वह सोचने लगता है, ’’ अब झेलो बच्चू.....किसी की भी पीठ में छूरा भौंकने से बाज न आते थे....... अब अपने पर पड़ी है तो रोने के लिए कन्धा ढूंढ रहे हो....” मेरे एक पड़ोसी, आत्मीय, व मित्र हैं........(सुविधा के लिए उनका नाम ‘‘ख’’बाबू रख देते हैं।) जिनका सबसे प्रिय पास-टाइम है लोगों के घर जाना........... अफसोस करने। मित्र, पड़ोसी, प्रियजन के अतिरिक्त रेल के डिब्बे में मिले किसी अपरिचित के दुःख का भी यदि उन्हें आभास मिल गया तो पत्नी से कहेंगे, ’’भागवान तैयार हो जा... फलां के घर अफसोस करने जाना है...... बहुत दिन से तू घर से निकली भी नहीं है..... चल लौटते में चप्पल भी खरीद लीजो......’’ आज की व्यस्त दिनचर्या में किसी के पास इतना समय नहीं है कि दोस्तों को चाय पर बुलाए और गपशप करके समय बर्बाद करे, लेकिन तबियत खराब होने पर वही व्यक्ति अफसोस करने आए साथियों की खूब आवभगत करता है, चाय पिलवाता है, और आग्रह से कहता है, ‘‘ धन्यवाद भइया फिर आइएगा।’’ हमारे ‘ख’ बाबू को ऐसे ही दोस्तो की तलाश रहती है। पूरे शहर का चक्कर लगाते रहते हैं कि आज किसके घर आदर-सत्कार से चाय पी जा सकती है, वह भी बिना किसी फिरौती के। एक बार तो बस हद ही हो गई। ’ख‘ बाबू के पड़ोसी मिश्रा जी के समधी के साले की देर रात रोड एक्सीडेण्ट में अचानक मृत्यु हो गई। मिश्रा जी के घर पर भी मातम छाया हुआ था। सुबह से ही लोग-बाग अफसोस प्रकट करने आ-जा रहे थे। मिश्राइन ने घर के बैठकखाने में सफेद चादर बिछाकर आगन्तुकों के स्वागत का पूरा इन्तजाम कर दिया था। हाथ जोड़कर स्वयं भी आ बिराजीं थी, यह बात अलग है कि अपने समधी के साले से वे कभी नहीं मिली थीं, यहाँ तक कि उन्हें उसका नाम भी नहीं पता था, लेकिन आने जाने वालों के सामने बाल्टी-भर आँसू बहाकर उसकी तारीफों के कसीदे काढ़ने में कोई कोर कसर बाकी न रखी थी उन्होंने। “आपको याद है न भाईसाहब...... उस लड़के ने जब यूनिवर्सिटी में टाॅप किया था तब हमारे समधियों ने घर-घर मिठाई बाँटी थी..... स्वीमिंग और टेनिस खेल का तो चैंपियन था....... एक से एक मालदार घरों से सुन्दर-सुन्दर लड़कियों के रिश्ते आ रहे थे.......हाय री किस्मत! विधाता को कुछ और ही मंजूर था।‘‘ अपने हाव-भाव, स्वरों के उतार-चढ़ाव, व भंगिमाओं से मिश्राइन आगन्तुकों की भावनाओं को उद्वेलित करने में पूर्णतः सफल हो रहीं थीं। यदि आने और जाने वाले के बीच में थोड़ा सा एकान्त अन्तराल मिल जाता तो मिश्राइन रसोई में जाकर मुँह में कुछ डाल लेने के साथ समधियों के बड़बोलेपन, दिखावा, और घमंड का नतीजा भोगने का श्राप देकर वापस आकर मोर्चा सभाँल लेती और फिर शुरू हो जाता वही प्रलाप व आँसू का सिलसिला। ’ख‘ बाबू की व्यस्तता सुबह से ही शुरू हो गई थी। आने वालों को घर के अन्दर जाने का रास्ता दिखाने से लेकर किसी को पानी पिलाना तो किसी को बाथरूम का रास्ता दिखा रहे थे। पत्नी से घर पर कह आए थे कि खाना न बनाए, समघियों का मामला है, खाना तो मिश्रा के घर से ही जाएगा उनके घर............ तो अफसोस करने उन्हीं के घर चले चलेंगे दोनों। मिश्रा के समधी उनके भी तो समधी हुए, न गए तो कितना बुरा मानेंगे। फिर अगले तीन दिनों तक ’ख‘ बाबू के चेहरे पर शिकन बनी रही। घर के जरूरी काम जैसे दूध, ब्रेड, राशन भी उन्होंने तीसरे दिन के हवन के बाद ही लाना ठीक समझा। ’ख‘ बाबू की पत्नी भी काफी सुकून महसूस कर रहीं थी। ’ख‘ बाबू दिन भर घर से बाहर मिश्रा जी के घर ड्यूटी दे रहे थे, जिससे घर में शान्ति थी, न खिचखिच न पिचपिच, दूसरे उन्हें खाना भी नहीं बनाना पड़ रहा था। मिश्राइन मानती ही न थीं। ’ख‘ बाबू उनको भावनात्मक सहारा जो दिए हुए थे। साथ ही खाने का टोकरा पैक कराकर मिश्रा की गाड़ी में समधियों के घर ले जाने का दुरूह जिम्मा भी ’ख‘ बाबू ने अपने सिर ले रखा था। अच्छी बात यह हुई कि मिश्रा के समधी ’ख‘ बाबू से अत्यधिक प्रभावित व एहसानमन्द दिखाई दिए। ’ख‘ बाबू का दिल भी बल्लियों उछला। सोचने लगे अफसोस करने जाने के अनेकानेक फायदों में से एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि एक भरोसेमन्द, पद-प्रतिष्ठा वाले, सज्जन इंसान उनके दोस्त, और उनके कद्रदान बन गए। अब यदाकदा उनके घर भी जाना आना लगा रहेगा और पत्नी के साथ उनके घूमने की समस्या का भी हल निकल जाएगा। मेरे सुधी पाठकों जरा ध्यान से सोचिए कहीं सांत्वना देने या अफसोस करने के बहाने कोई ’ख‘ बाबू आपकी भावनाओं से मजा लेने या अपना उल्लू सीधा करने तो नहीं आए हैं। सुधा गोयल ‘नवीन’ *****************************************

Sunday, 17 April 2016

शर्मनाक फैसला

शर्मनाक फैसला

फैसला हुआ,
रेपिस्ट को पति का दर्जा दे दो।
एक पत्थर से दो शिकार कर लो।
सिन्दूर और संतान,
एक साथ,
झोली में लपक लो,
बोलने वालों की बोली,
गंदे इशारे,
छुपी हँसी को,
लाल जोड़े की चकाचौंध से मूक कर दो।
कर लो बेटी ऐसा कर लो  …
बाबा की मूँछ तनी की तनी रह पायेगी,
माँ शर्म की तलैया में नहीं,
पैसों की नदी में नहाएगी,
बहन-भाई-नाते-रिश्तेदार,
सभी को कुछ न कुछ मिल ही जाएगा।
सच चाहे जो हो, पर……
इज्जत पर आँच न आएगी  ....
बेशर्मी की इंतहा ही तो है,
कहते हो कि उसे लाइसेंस दे दो,
कभी भी, कहीं भी, कुछ भी करने का।
शादी से पहले जो रेप है,
क्रूरता, निर्लज्जता, पशुता,
या वासना है,
क्या वही
शादी कर लेने भर से,
प्यार, समर्पण, विश्वास और
पूजा में तदबील हो जाएगा।
नहीं.... कभी नहीं....
यह तो ह्त्या है, नृशंस ह्त्या।
कोमल भावनाओं की,
पवित्र बंधन के मर्यादा की,
नारी अस्मिता की,
सम्पूर्ण अस्तित्व की।
आह! कैसे तुम्हें यह मंज़ूर है।
तुम इसे  बगावत कहो
या मेरी ढिढाई  ,
काँटों का ताज पहनने की ज़िद,
या अंधे कुएं में छलांग लगाने की
मंशा  ....
पर मुझे अस्वीकार है, अस्वीकार है, अस्वीकार है  ………………
आपका यह फैसला।।

सुधा गोयल “नवीन”

Wednesday, 6 January 2016

निर्भया Poem



निर्भया
हार गई निर्भया,
जीत गया दोषी, निर्भया का ।
साबित हो गया एक बार फिर,
क़ानून अँधा है अंधा ही रहेगा।
शायद वह बहरा भी हो चुका है,
निर्भया की चीखें, माँ का आर्तनाद,
पिता की दलीलें, मीडिया का शोर,
गुम हो गए, बेअसर हो गए।
हार गई निर्भया,
जीत गया दोषी, निर्भया का ।
हाय री विडंबना।
अपराध बड़ा है तो उम्र भी बड़ी होनी चाहिए,
उम्र छोटी है तो बड़ा अपराध भी,
छोटा ही गिना जाना चाहिए।
फिर कोई क्यों न करें बड़े अपराध,
सहारा लेकर मासूम कन्धों का,
पीठ पर जब हाथ है बुत बनें अंधों का।
क्रंदन इक माँ का प्रभु सुन लीजो,
अगले जनम मोहे बिटिया न दीजो,
या फिर ऐसे देश में पैदा कीजो,
जो गूंगा बहरा अंधा न हो,
सीने में जिसके दिल भी धड़कता हो।
जहाँ पाश्विकता पर कोड़ों से प्रहार हो,
ईमान, शर्म, नैतिकता की न हार हो।
ऐ नारी अस्मिता के ठेकेदारों,
बड़े-बड़े वादों-नारों वाले देश के पहरेदारों,
करुण पुकार, दम तोड़ती सिसकी निर्भया की,
क्या सुनाई देती है आवाज़ आत्मा की,
तो फिर भगवान के लिए ऐसा कदम ना लीजो,
फिर किसी निर्भया के दोषी को,
रिहा मत कीजो।
ना हारे कोई निर्भया बार-बार,
ना सिसके कोई ज्योति,
और ना जीते कोई दोषी हर बार।।

Thursday, 29 October 2015

हाउस नंबर 302 (लघु कथा)

(लघु कथा)

हाउस नंबर 302

हर दिन जब मैं कॉमन गैराज में गाड़ी पार्क करता हूँ, अक्सर एक खिड़की पर जाकर मेरी नज़र टिक जाती है। वह खिड़की  हाउस नंबर 302 की रसोई या जिसे आज की भाषा में हम किचेन कहते हैं, की लगती है क्योंकि मुझे गैस का चूल्हा भी दिखाई पडता है। गैराज की सतह से किचन की सतह लगभग तीन सीढ़ी की ऊंचाई पर होगी इसलिए मुझे किचन का पूरा दृश्य दिखाई नहीं देता। लेकिन जिस कारण मेरी नज़र हर दिन उस खिड़की की तरफ उठती है उसका कारण है रात के साढ़े दस बजे रोज़ एक भद्र पुरुष का गैस स्टोव पर सब्जी छौंकना। मैं अपने काम से लगभग रोज़ ही इसी समय घर आता हूँ। मेरी पत्नी मेरे लिए खाना गर्म करती है, गर्म फुल्के बनाती है और मुझे गर्म खाना खिलाकर परम सुख और आनंद का अनुभव करती है। यह बात वह मुझे गर्व से अनेकानेक बार बता चुकी है। जब मैं गरमागरम खाना खा रहा होता हूँ तब मुझे वह भद्र पुरुष याद आता और मैं सोचने लगता , बेचारा कितना दुःखी है कि दिन भर हाड़-पेल मेहनत के बाद कोई उसे गर्म खाना खिलाने वाला भी नहीं है। बेचारे की क्या-क्या मजबूरियाँ होंगी कि एक खाना बनाने वाली भी नहीं रख सकता। पत्नी ने छोड़ दिया होगा या फिर दुनिया से ही चली गई होगी ,वरना किसे पागल कुत्ते ने काटा है जो आधी रात में सब्जी छौंकता है, फिर उसके बाद रोटी बनाता होगा।
दिन बीतने के साथ मेरी उस भद्र पुरुष में दिलचस्पी भी बढ़ती गई। अब मैं उसके हाव-भाव पढने की कोशिश करता, परन्तु मुझे ठीक से कुछ भी दिखाई न देता, अधिक देर वहाँ रुककर मैं हँसी का पात्र बनना भी नहीं चाहता था, लेकिन मेरे ज़हन में रह-रह कर सवाल उठते। कही उसकी पत्नी अपाहिज तो नहीं है, या फिर इतनी बीमार रहती है कि बेचारे को काम से लौटने के बाद खाना बनाना पड़ता है। खाना बनाने, खिलाने और समेटने के बाद, १२बजे से पहले तो सो नहीं पाता होगा। फिर सुबह सबेरे काम पर जाता ही होगा। मैं सोचने लगा, मेरी पत्नी भी काम करती है फिर भी दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती महंगाई के कारण हमें कुछ खर्चों पर अपना मन मारना ही पड़ता है। आजकल एक आमदनी में गुज़ारा करना कितना कठिन है। यह भद्र पुरुष कितनी चीज़ों के लिए मन मार कर रहता होगा।
मन ही मन मैं प्रार्थना करने लगता, कि हे भगवान इसकी पत्नी को स्वस्थ कर दो। आखिर पुरुष होने के नाते कहीं न कहीं मेरा उससे भावनात्मक रिश्ता जुड़ चुका था। मैं सोचता यह पुरुष नाम का प्राणी  अपने पूरे जीवन-काल में महिला के रूप में कभी माँ, कभी बहन, तो कभी पत्नी पर किस हद तक आश्रित रहता है। स्त्री ही वह प्राणी है जो पुरुष को दैहिक और दैविक सुखों से साक्षात्कार करवाती है। मुझे लगता कि वह व्यक्ति मुझसे कहीं अधिक साहसी, धीर-गम्भीर, और परिपक्व विचारों वाला होगा, क्योंकि मैं तो शायद ऐसी परिस्थिति में पागल ही हो जाता।
क्या उस भद्र पुरुष की कोई संतान है? यदि है तो बेचारे को उसे भी स्कूल भेजना , टिफिन तैयार करना , ड्रेस प्रेस करना  और होमवर्क भी करवाना होता होगा , और यदि नहीं है तो हाय री उसकी किस्मत, गृहस्थाश्रम  के महान कर्म, धर्म एवं  आनंद से वंचित है बेचारा !!  
मेरी वैचारिक यात्रा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।  प्रति दिन मैं पिछले दिन की अपेक्षा अधिक उदास और थका-हारा घर लौटता। पहले मैं केवल अपनी बलेरो गाडी पार्क करने के बाद उसे देखता और विचारों के झंझावात में फंसता था, लेकिन अब मुझे दिन में, ऑफिस में भी उसी का ख्याल आता रहता कि वह क्या कर रहा होगा।? उसने लंच किया भी है या नहीं? घर जाते हुए क्या वह सब्जी भी खरीदता है?
मेरी पत्नी ने सब्जी खरीदने की जिम्मेवारी भी अपने ऊपर ही ले रखीं है। ऑफिस के काम के  साथ-साथ मेरी पत्नी घर के सारे छोटे-बड़े काम गज़ब की  फुर्ती, लगन, खुशी और सहजता से निबटाती है।  उसने मुझे कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि जैसे पैसा कमाने में वह मेरा साथ देती है, उसी तरह घर चलाने में मुझे उसका साथ देना चाहिए। सहसा मैं स्वयं को दुनिया का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति समझने लगता। लेकिन तत्छण मेरी विचारधारा पुनः उस भद्र पुरुष की ओर मुड़ जाती और मैं गमगीन हो जाता।
मेरी पत्नी से मेरा दुःख देखा नहीं जा रहा था। व्यवहारकुशल, हँसमुख, सबके स्नेह की स्वामिनी  मेरी पत्नी एक दिन  हाउस नंबर 302 जाने का मन बना लेती है। उसने मुझसे कहा कि आज इतवार है और पोलियो ड्रॉप्स बंटने  का दिन है। वह  रोटरी संस्था (जिसके हम सदस्य हैं) की वॉलेंटियर बनकर उनके घर जायेगी और वास्तविकता  का पता लगाकर मेरी सहधर्मिणी होने का सबूत देगी।
मेरे अति प्रिय पाठको, आप शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते  कि उस दिन जब मेरी पत्नी उनके घर से लौटकर आई और उसने मुझे विस्तार से उनके घर की राम-कहानी सुनाई तो वह जिस प्रचण्डता  से हँस रही थी मैं उतनी ही प्रचण्डता से शर्म व हीनता-बोध से ग्रसित होता जा रहा था।
कहानी कुछ इस प्रकार थी।
हाउस नंबर 302 में पाँच फुट दस इंच लम्बे शालीन, सुसंस्कृत, गम्भीर प्रकृति के डॉक्टर चौधरी अपनी  बेहद आकर्षक, सुन्दर डॉक्टर पत्नी शमिता के साथ रहते थे।  उनका एक दो साल का प्यारा सा बच्चा भी था।  जिसे दिनभर आया के पास छोड़ कर दोनों मियाँ बीबी अपने नर्सिंग होम जाते। क्योंकि बच्चा दिनभर अकेला रहता इसलिए शाम को घर आने के बाद से देर रात तक, जब तक बच्चा सो नही जाता वे दोनों उसके साथ खेलते और उसके सोने के बाद एक साथ मिलकर खाना बनाते और खाते। क्योंकि पति को सब्जी काटनी नहीं आती इसलिए वो छौंकता था। आटा बीबी सानती और रोटी बेलकर देती और पति सेंकता था। उनके किचन में गैस जिस काउंटर पर थी उसके ठीक पीछे के काउंटर पर काटने -सानने का काम चलता रहता था जो मुझे कभी दिखाई नही दिया और मैंने……………………. .  
वह दिन और आज का दिन मैंने किसी भी मसले की गहराई में जाने से पहले अपनी राय कायम करना छोड़ दिया है।

सुधा गोयल ‘नवीन’
जमशेदपुर




मेरे खत का ज़बाब आया है

मेरे खत का ज़बाब आया है

हां उसने मुझे बुलाया है,
कल मेरे खत का जबाब आया है।

याद नहीं दिन, महीने, बरस,
कब भेजा था उसे मैंने एक खत।

इतना याद है ज़रूर तब आँखों पर नहीं चढ़ा था चश्मा,
देख सकती थी मैं नंगी आखों से रंगीन सपना।

वह दिन कहता तो मैं दिन और वह रात कहता तो कहती मैं रात,
कड़वी बातें भुला देती थी, मानकर उसे अपना।

उसकी हंसी और ज़रा सी ख़ुशी पर मैं,
आपना  सब कुछ लुटाने को तैयार थी,
कही-अनकही बातें जानकर भी,
झुठलाने को तैयार थी।

अपनी खुशियों की नींव पर मैंने,
उसके सुखों का घरौंदा बनाया था,
इंसान बनाने के लिए इंसानियत का पाठ पढ़ाया था,
आदर-प्यार आदि संस्कारों को घुट्टी में मिलाकर पिलाया था।
उसने भी मुझे विश्वास दिलाया था,
जाकर विदेश केवल और केवल इंसान बनकर वापस आएगा,
मेरे हसींन सपनों को और रंगीन बनाएगा।
फिर ना वह आया ना ही उसका कोई खत,
दिन महीने बीत रहे थे बरस पर बरस।

पर मुझे यकीन था वह आएगा,
न कभी ठेस पहुंचाई थी ना ही पहुचायेगा।

मेरे संस्कारों की बेड़ियों से वह बंधा था,
राम-कृष्ण अशोक जैसे पूर्वजों का जना था।

कल मेरे खत का जबाब आया है,
हां उसने मुझे बुलाया है।

माँ को अपने सिर आँखों पर बैठाने के लिए,
आदर-मान और सब सुख संपन्न कराने के लिए,
जो ना मिला कभी चरणों में लुटाने के लिए,
आतुर है वह मुझे बुलाने के लिए।

बेटा मैंने खत लिखा था तुम्हें बुलाने के लिए,
काश! तुम स्वयं आते मुझे मनाने के लिए,
तुम्हारी एक झलक काफी होती बरसों का गम भुलाने के लिए।

इस लम्बे अंतराल ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है,
घड़ी की सुइयों ने घूम-घूम कर समझाया है,
कि समय बड़ा ही बेशरम सरमाया है।

वहाँ तेरे पास सम्पदा ही सम्पदा है,
यहाँ मेरे पास समय की पूंजी है,
तू अपनी सम्पदा में खुश रह,
मुझे अपनी पूंजी सहेजने दे,
क्योंकि उसमें तेरी यादें, तेरी बातें, तेरी शिकायतें,
और तू ही तू समाया है।।

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सुधा गोयल 'नवीन'



वट सावित्री पूजा की पूर्व संध्या पर

हे सावित्रे,
हे पति परायणे,
त्याग, तपस्या, की मूर्ति,
हे देवि, हे सती, हे सधवा,
युगों-युगों से बलिदान की
तुम्हीं हो परिभाषा।  
हे आदर्श पत्नी,
अनगिनत पीढ़ियों के लिए मिसाल,
नर-मुनि-देवता भी करते हैं जिसे
शत-शत प्रणाम!
हर माँ रखना चाहे, बेटी का नाम,
तुम्हारा, क्योंकि,
मात्र तुम्हारा नाम रखने भर से,
सत गुणों का स्थानान्तरण तय है।
हे मुनि कन्या,
एक अरज़ मेरी भी सुनना,
किसी जनम में
बनकर सत्यवान, अपने गुणों को,
विस्तारित करना,
हर पुरुष तुम सा एकनिष्ठ,
पत्नी परायण, समर्पित
और भावुक हो जाए,
विनती मेरी इतनी सुनना,
फिर ना  बलात्कार होगा,
ना ही चीर-हरण, और
ना ही  बालिकायें आत्मदाह को,
मज़बूर होंगी।  
एक बार पुरुष योनि में समाकर,
तुम्हें पुरुष का खोया गौरव
लौटाना होगा।
उनके सम्मान, उनके गुरुपद,
पर हमारा विश्वास जगाना होगा।
फिर एक बार तुम्हें आना होगा,
आना ही होगा।।

सुधा गोयल "नवीन "

16.5.15

मेरा शहर --- जमशेदपुर



मेरा शहर --- जमशेदपुर

सुधा गोयल "नवीन"


जो जमशेद जी नौसेरवान जी के सपनों की उड़ान है,
जहाँ दलमा की पहाड़ियां हैं,
स्वर्णरेखा और खरकाई का संगम भी,
बाग़ बगीचे, ताल- तलैया, फूल भौंरे अनगिनत तितलियाँ,
जहाँ आम लीची अमरूद केला घर घर की शान है
और जिस पर मौसम भी मेहरबान है,

जहाँ रंग भेद और ऊंच नीच को जाता है दुत्कारा
जिसने हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सबको है स्वीकारा,

फौलादी इरादों वाले यहाँ बनाते है फौलाद,
यहीं की उपज हैं अस्तद, प्रियंका, माधवन, और इम्तियाज.......
जमशेदपुर, कहो या कहो टाटा, हम करते हैं इस पर नाज …...